
सावरकर ने कुत्तों और गधों से की थी गाय की तुलना
जनसत्ता की एक रिपोर्ट के अनुसार हिंदू महासभा के संस्थापक और हिंदुत्व की परिभाषा देने वाले विनायक दामोदर सावरकर गाय, गोमूत्र और गौ हत्या को लेकर आम परंपरावादियों से अलग विचार रखते थे. सावरकर गायों की सेवा के पक्ष में थे लेकिन उन्हें पूजने के खिलाफ थे.
भारत में गाय सिर्फ जानवर मात्र नहीं है, आज उसका राजनैतिक महत्व है. उस पर राजनीति कर सत्ताएं उठती और गिरती है. उसके अपने सामाजिक, राजनीतिक और आर्थिक महत्व हैं. गोकि इतिहास की किताबों में गो पूजन से लेकर गो भक्षण तक जिक्र मिल जाएगा.
वैदिक काल पर वैज्ञानिक शोध करने वाले इतिहासकार डॉ. डी. एन. झा ने अपनी किताब ‘द मिथ ऑफ़ होली काउ’ में यह साबित किया है कि प्राचीन भारत में गोमांस खाया जाता था. वहीं दूसरी तरफ हिंदू आबादी द्वारा गाय को पूजने के साक्ष्य भी मिलते हैं.
गाय की सुरक्षा के नाम पर देश में कई घटनाएं भी हुई हैं. इंदिरा गांधी के शासन काल में गाय के लिए साधु-संतों के समूह ने संसद पर चढ़ाई कर दी थी. गोरक्षा के नाम पर आज भी मॉब लिंचिंग जैसी घटनाएं होती हैं, जिसे देश की सत्ता का पूर्ण संरक्षण प्राप्त है.
कुल मिलाकर वर्तमान समय में भी ‘गाय’ भारत के लिए बेहद संवेदनशील मुद्दा है. तमाम हिंदू कट्टरपंथी दक्षिणपंथी संगठन एक सुर में गौ पूजन और गौ-रक्षा की अपनी प्रतिबद्धता को दोहराते हैं, भले ही व्यवहार में विदेशों में गोमांस निर्यात लगातार बढ़ता जा रहा है.
लेकिन स्थिति हमेशा ऐसी नहीं थी. हिंदुत्व की परिभाषा देने वाले विनायक दामोदर सावरकर गाय, गोमूत्र और गौ हत्या को लेकर आम परंपरावादियों से अलग विचार रखते थे. वह न सिर्फ गो पूजन के खिलाफ थे, बल्कि यह सवाल भी उठाते थे कि गौ हत्या ही पाप क्यों ? भैंस हत्या या गधे की हत्या पाप क्यों नहीं ?
गाय की पूजा तो गधा पूजा क्यों नहीं ?
हिंदू महासभा के संस्थापक सावरकर ने अपने कई लेखों में गाय के मुद्दे पर मुखरता से लिखा है. सावरकर अपने लेख ‘गोपालन हो, गो पूजन नहीं’ में लिखते हैं, ‘गाय तो प्रत्यक्ष पशु है. मनुष्यों में निर्बुद्ध लोगों जितनी बुद्धि भी जिसमें नहीं होती ऐसे किसी पशु को देवता मानना मनुष्यता का अपमान करना है.’
‘सावरकर समग्र’ में संकलित एक अन्य लेख ‘गोग्रास’ में वह लिखते हैं, ‘गाय का कौतुक करने हेतु उसके गले में घंटा बांधिए, परन्तु भावना वही होनी चाहिए जो कुत्ते के गले में पट्टा बांधते समय रहती है. भगवान के गले में हार डालते हैं उस भावना से नहीं.’
‘गोपालन हो, गो पूजन नहीं’ में गोहत्या के सवाल पर सावरकर लिखते हैं, ‘गोहत्या ही पाप क्यों ? भैंस हत्या या गधे की हत्या पाप क्यों नहीं ?’ गाय की उपयोगिता को श्रेष्ठ बताने पर सवाल उठाते हुए वह लिखते हैं, ‘गधा इतना उपयुक्त और इतना प्रमाणिक, इतना सहनशील कि उसको पशु न मानकर देवता मानना चाहिए था. क्या किसी ने गधा गीता लिखकर गधा पूजन संप्रदाय निकाला है ?’
अशोक कुमार पाण्डेय की किताब ‘सावरकर काला पानी और उसके बाद’ में सावरकर की एक अन्य टिप्पणी का जिक्र मिलता है, जिसमें वह लिखते हैं, ‘जैसे मनुष्य के लिए गाय एक उपयोगी पशु है इसलिए उसकी हत्या नहीं होनी चाहिए. इसके विपरीत जब यह पशु उपयुक्त न होते हुए हानिकारक होगा, उस स्थिति में गो हत्या भी आवश्यक है, ऐसा जवाब विज्ञान देता है.’







