भारत के प्रधानमंत्री देश में कैशलेस लेनदेन की बात करते हैं। वह चाहते हैं कि भारत का फकीर भी स्वाइप मशीन का इस्तेमाल करे। लेकिन शायद उन्हें मालूम नहीं कि दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यस्था वाले अमरीका में भी केवल 45% प्रतिशत लोग ही कैशलेस लेनदेन करते हैं जबकि जापान में 14% और चीन में 10% की कैशलेस लेनदने होता है। जबकि इन दोनों एशियाई देशों की अर्थव्यवस्था भारत के मुकाबले बहुत मज़बूत है और साक्षरता भी बहुत अधिक है। दूसरी ओर भारत में केवल 2% लोग ही कैशलेस लेनदेन कर पाते हैं। इसका मतलब यह हुआ कि कैशलेस लेनदेन उन देशों के लोग अपनी अर्थव्यवस्था को ताकत देने (पूंजीपतियों को आसान कर्ज देने और माफ करने ) के लिए नहीं बल्कि समय की बचत और आसानी के लिए करते हैं। वह ऐसा इस लिए कर पाते हैं क्योंकि उसमें सक्षम हैं और उसके लिए सुविधाएं उपलब्ध हैं। वहीं कैशलेस लेनदेन का चलन सिंगापुर, बेल्जियम, स्वेडन जैसी छोटी और अर्थव्यवस्थाओं में 50% से अधिक है, उसका बड़ा कारण शिक्षा और सुविधा भी है। भारत जैसी विशाल अर्थव्यवस्था जहां निरक्षरता, निम्न स्तरीय शिक्षा एक बड़ा मुद्दा है, बैंकों तक में सरवर डाउन होने की समस्या के चलते काम–काज ठप हो जाता है, सुविधाओं का अभाव है, कैशलेस लेनदेन की बात करना कोरी बकवास के अलावा कुछ भी नहीं है।
Author: Rohit Sharma
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